बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक ऐसा गांव है, जहां के लोग अपने तालाब की मछलियों का शिकार नहीं करते हैं. जानें कारण
मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर में बाबा दूधनाथ मंदिर का इतिहास काफी पुराना है. मान्यताओं के अनुसार रामजानकी मठ के महंत को खुद भोलेनाथ ने मंदिर निर्माण के लिए सपने में दर्शन दिया था. लोगों के अनुसार भोलेनाथ ने सपने में कहा था कि मैं अवतरित होने वाला हूं, मंदिर बनवाओ. उसके बाद महंत ने ग्रामीणों को अपने सपने के बारे में बताया और खुदाई शुरू करवाई. खुदाई के दौरान एक शिवलिंग मिला. उस दौरान शिवलिंग के सिर पर चोट लगी और दूध बहने लगा, जिससे एक तालाब प्रकट हुआ.

इस गांव में मछलियों का नहीं होता शिकार : आज इस तालाब (दूधिया पोखर) में अनेकों अनेक मछलियां हैं, लेकिन उन्हें भूल से भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है. मुसहरी प्रखंड के छपरा मेघ गांव गांव के ग्रामीण इस तालाब की मछलियां खाते नहीं बल्कि मछलियों को दाना खिलाते हैं. गांववालों के ऐसा करने के पीछे एक बड़ी धार्मिक वजह है. मान्यताओं के अनुसार इस तालाब में पल रहीं मछलियां दैवीय हैं और खुद भोलेनाथ उनके रक्षक हैं.

दैवीय मानी जाती हैं मछलियां : मुसहरी प्रखंड के छपरा मेघ गांव में आज भी आस्था और परंपरा का ऐसा मेल देखने को मिलता है, जिसने पूरे इलाके को अलग पहचान दी है. यहां के लोग अपने प्राचीन तालाब की मछलियों का शिकार नहीं करते, बल्कि उन्हें दाना, आटा और मुढ़ी (मुरमुरा) खिलाते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि ये मछलियां दैवीय स्वरूप रखती हैं और इनका संरक्षण करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है.

बाबा दूधनाथ महादेव मंदिर की खासियत: मंदिर के पुजारी अर्जुन कुमार ने बताया कि तालाब को लेकर लोगों में पौराणिक आस्था है. बाबा दूधनाथ महादेव का स्थान है और खुदाई के समय बाबा महादेव के सिर पर थोड़ी चोट लगी थी और वह कट गया था. जिसके कारण तालाब दूध से भर गया था. उसके बाद काफी पूजा-पाठ के बाद महादेव की स्थापना की गई. लोग दूर-दूर से यहां दर्शन करने आते हैं.

“मछली को दाना खिलाने से शुभ होता है. घर में सुख शांति आती है. इस तालाब से कोई मछली नहीं पकड़ता है. मछली को पकड़ना और खाना पूर्ण रूप से वर्जित है.”- अर्जुन कुमार, मंदिर के पुजारी
गांव के बुजुर्ग कन्हैया लाल सिंह बताते हैं कि छपरा मेघ का इतिहास लगभग हजार वर्ष पुराना है. यहां स्थित रामजानकी मठ और बाबा दूधनाथ के स्वरूप की कथा पीढ़ियों से लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है. कन्हैया लाल के अनुसार, वर्षों पहले जब इस तालाब की खुदाई हो रही थी, तभी एक पत्थर निकला. खुदाई के दौरान उस पत्थर पर हल्की चोट लग गई और वहां से दूध जैसा तरल पदार्थ निकलने लगा.

“यह घटना ग्रामीणों और साधुओं के लिए अद्भुत थी. उसी रात मठ के पुजारी को सपने में भगवान शंकर ने दर्शन दिए और स्वयं को दूधेश्वर नाथ का एक स्वरूप बताया. आदेश मिला कि इसी स्थान पर उनकी स्थापना की जाए. इसके बाद पत्थर को मंदिर में स्थापित किया गया और तालाब को शिवगंगा का रूप मानकर पूजा-अर्चना शुरू हुई.“- कन्हैया लाल सिंह, ग्रामीण
मछलियों को नुकसान पहुंचाने पर गांव में विपत्ति: स्थानीय मान्यता है कि इस तालाब से जुड़ी वस्तुओं का अपमान या यहां की मछलियों को नुकसान पहुंचाने से पूरे गांव पर विपत्ति आ सकती है. इसी कारण यहां मछली पकड़ना सख्ती से वर्जित है. ग्रामीण इसे सिर्फ पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के पवित्र स्थल के रूप में देखते हैं. उनका विश्वास है कि तालाब की मछलियों को दाना खिलाने से दरिद्रता दूर होती है और घर में शुभ फल प्राप्त होता है.

‘दूधिया पत्थर का प्रकट होना था चमत्कार’: गांव के कुमार सौरभ भी इसी कथा की पुष्टि करते हैं. वह बताते हैं कि वर्षों पहले रामजानकी मठ के महंत को सपना आया कि तालाब की खुदाई करवाई जाए, क्योंकि भगवान प्रकट होने वाले हैं. जब पहली बार खुदाई हुई, तब कुछ नहीं मिला, लेकिन दूसरे सपने के बाद जब फिर खुदाई की गई, तो इसी दूधिया पत्थर का प्रकट होना पूरे गांव के लिए चमत्कार जैसा था.
“तब से इस तालाब को दूधिया पोखर भी कहा जाने लगा है. लोगों का विश्वास है कि इस तालाब की पवित्रता बनाए रखना पूरे गांव के लिए वरदान है. अगर कोई मछली पकड़ने की कोशिश भी करे तो उसे अनहोनी का भय सताने लगता है.”– कुमार सौरभ, ग्रामीण

मछलियों को दाना डालने से मनोकामना पूरी: आज भी हर दिन मुजफ्फरपुर शहर और आसपास के सैकड़ों लोग इस तालाब में मछलियों को दाना डालकर मनोकामना मांगने आते हैं. कई परिवार यहां पूजा के बाद मछलियों के लिए आटा और मुढ़ी चढ़ाते हैं. उनका मानना है कि ऐसा करने से उनके घर में सुख-शांति और आर्थिक तरक्की आती है.
पर्यावरण संरक्षण का भी अनोखा उदाहरण: छपरा मेघ गांव में यह परंपरा केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी अनोखा उदाहरण बन गई है. यहां की मछलियां गांव की आस्था से जुड़ी हैं और पीढ़ियों से सुरक्षित हैं. तालाब की स्वच्छता और संरक्षण भी ग्रामीण सामूहिक रूप से करते हैं. यही कारण है कि यह स्थल आज भी अपनी प्राचीन महिमा और लोकविश्वास के साथ जीवित है.







