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नक्सलियों के गढ़ में जांबाज मां की हिम्मत बनी मिसाल, बेटे को बना डाला IAS अधिकारी

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बिहार की रेणु देवी की कहानी प्रेरणादायक है, जिनकी मेहनत और जिद ने बेटे को IAS अधिकारी बना दिया. पढ़ें

गया: 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है. ऐसे में बिहार की एक मां की चर्चा जरूरी हो जाती है, जिनके हौसलों और कड़ी मेहनत ने गरीबी को दरकिनार कर बेटे को IAS अधिकारी बना दिया. भले ही सफलता बेटे की हो, लेकिन इसके पीछे उस मां का पसीना बहा है, जिसके सपोर्ट के लिए कोई नहीं था. गया की रेणु देवी (60) की हिम्मत इसी बात से समझी जा सकती है कि पति की मौत के बाद वह बच्चों की हिम्मत बरकार रखने के लिए खुलकर रोई तक नहीं थी. ईटीवी भारत से बात करते हुए आखिरकार बेटे की सफलता देख रेणु देवी अपने आंसू नहीं रोक सकी.

पति की मौत के बाद खुलकर रोई नहीं: रेणु देवी बताती हैं कि मैं अपने पति की मौत के बाद खुल कर रोई नहीं थी. क्योंकिं मुझे डर था कि गम में निढाल होकर अगर मैं टूट गई तो मेरा परिवार बिखर जाएगा. बच्चे अपनी सफलता के ख्वाब नहीं देखेंगे. उनकी हिम्मत और तपस्या का ही नतीजा है कि उनका बेटा आज आईएएस अधिकारी बन चुका है

मैंने वर्षों अपने गम और संघर्षों को अपने बच्चों के सामने जाहिर नहीं होने दिया, लेकिन मैं उस दिन खूब रोई जब मेरे संघर्षों का परिणाम बेटे की सफलता के रूप में सामने आया. मेरा एक बेटा आईएएस बन गया है. वहीं एक बेटा शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा है.”– रेणु देवी, आईएएस संदीप की मां

डुमरिया की रेणु का संघर्ष: गया जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर डुमरिया प्रखंड बाजार की रेणु देवी निवासी हैं. पति शंभू कुमार की मौत के बाद परिवार आर्थिक तंगियों से जूझ रहा था. रेणु देवी बताती हैं कि साल 2017 में पति शंभू कुमार के निधन के बाद पूरे परिवार और घर की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई. उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि किराना दुकान चलाते हुए उन्होंने ना केवल अपने बच्चों की अच्छी परवरिश की बल्कि उन्हें अच्छी शिक्षा भी दिलाई.

IAS बना बेटा: रेणु देवी ने सबसे बड़े बेटे नीतीश कुमार को पढ़ा-लिखाकर अपने साथ कारोबार में लगाया. अपने दूसरे बेटे संदीप कुमार को अपने संघर्षों की मिसाल के लिए तैयार किया. उन्होंने उसे देश की सबसे कठिन परीक्षा सिविल सेवा परीक्षा के लिए तैयारी करवाई. बेटे ने भी मां को निराश नहीं किया, बल्कि हर बार अपनी मेहनत से बाधाओं को पार करता गया

मां ने संदीप के सपने को दी उड़ान: बड़ा बेटा नीतीश कुमार कहता है कि संदीप का भी सपना पिता की मौत के बाद टूट गया था, तब मां रेणु देवी ने घर की जिम्मेदारी संभाली और कर्ज उधार लेकर दुकान चलाना शुरू किया. उन्होंने न सिर्फ परिवार को आर्थिक तंगियों से उभारा बल्कि अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाकर सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

“संदीप ने पिता की मौत के बाद मां रेणु के कहने पर यूपीएससी की तैयारी की और अब वो देश की सबसे बड़ी परीक्षा पास कर IAS बन गए हैं, लेकिन उनके अधिकारी बनने में मां रेणु देवी की मेहनत, संघर्ष तपस्या शामिल है. संदीप को देखकर इस इलाके के लोगों की आंखें खुलेंगी और अपने बच्चों को पढ़ाने में ध्यान देंगे. मेरी मां ने हमलोगों का मार्गदर्शन किया. हमारे साथ जो भी हुआ मां के संरक्षण में ही हुआ है.”- नीतीश कुमार, रेणु देवी के बड़ा बेटे

लगातार तीन बार किया UPSC क्रैक: बेटे ने भी मां के संघर्षों से प्रेरणा ली और हालात से लड़ते हुए खुद को इतना मजबूत बनाया. यूपीएससी में एक बार नहीं बल्कि लगातार तीन बार सफलता प्राप्त की. संदीप पहली बार IRS ‘ इंडियन रेलवे सर्विस ‘ की सफलता में ही आगे की तैयारी बंद करना चाहते थे, ताकि वो घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने में मां और भाई की मदद कर सकें, लेकिन मां की जिद थी कि बेटा सबसे बड़ा अधिकारी बने.

IRS.. IPS और फिर IAS : संदीप पहले अटेम्प्ट में आईआरएस बने, दूसरे प्रयास में वह आईपीएस बने, आईपीएस की ज्वाइनिंग भी उन्होंने की और पूरा प्रशिक्षण हैदराबाद में लिया. उन्हें आईपीएस में तमिलनाडु कैडर मिला था, लेकिन मां ने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि बेटे को तब तक प्रेरित और सहायता करती रही जब तक कि वो आइएएस नहीं बने. संदीप 2025 में ही आइएएस बने हैं, वो फिलहाल मैसूरी में प्रशिक्षण ले रहे हैं, उन्हें आईएएस में उत्तर प्रदेश  प्राप्त हुआ है.

दुकान बेचने की आ गई थी नौबत: ईटीवी भारत से बात करते हुए रेणु देवी कहती है कि संदीप की सफलता सिर्फ उसकी मेहनत ही नहीं बल्कि मेरे संघर्षों की कहानी भी है. संदीप की पढ़ाई के लिए मैं अपने दुकान तक को बेचने के लिए तैयार थी. एक समय ऐसा भी आया जब दुकान तो थी लेकिन उसमें सामान नहीं था क्योंकि समान खरीदने और महाजन को देने के लिए पैसे नहीं थे.

“सारे पैसे संदीप की पढ़ाई पर खर्च कर रही थी. मैं तन्हाई में बैठकर रोती थी. एक महिला के लिए सबसे बड़े दुखों का पहाड़ उसके पति की मौत होती है. आर्थिक स्थिति तो पति के समय भी कमजोर थी, लेकिन वो एहसास नहीं होने देते थे. वो अकेले मेहनत करते थे. हम घर बार के कामकाज में लगे होते थे, लेकिन उनकी मौत के बाद मानो मेरी दुनिया रुक गई.”- रेणु देवी, आईएएस संदीप की मां

संदीप ने की फोन पर बात: पति की मौत के बाद रेणु देवी का अद्भुत संघर्ष परिवार को संभालने में और सफल बनाने में छुपा है. बेटे भी अपनी मां के उस संघर्ष को भूले नहीं हैं. फोन पर बात करते हुए संदीप कुमार खुद कहते हैं कि उनकी मां सफलता की कुंजी

“वो (रेणु देवी) एक योद्धा महिला है, जिसको विपरीत परिस्थितियों में गुजरना पड़ा. कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी.परिवार को संभाला और हमें पढ़ाकर आईएएस बनाया है. मेरी मां मेरे लिए सुपर वूमेन है. वह हमारी आइडियल है. आज भी जब हमें कोई मुश्किल होती है तो बस आंख बंद कर मां और उनके संघर्षों को याद करते हैं. रास्ता खुद ब खुद निकल आता है.“- संदीप कुमार, आईएएस

कभी था नक्सलियों का था गढ़ : बड़ा बेटा नीतीश कुमार कहते हैं कि यह उस क्षेत्र की कहानी है जो चार पांच दशकों तक नक्सल के आतंक से प्रभावित रहा है. यहां महिलाएं क्या पुरुषों को भी खुलकर सांस लेने में डर लगता था. इस क्षेत्र में कुछ वर्षों पहले ना सिर्फ नक्सलियों का आतंक था बल्कि शिक्षा के अभाव में महिलाओं के लिए खुलकर जीना भी बड़ी कठिन राह थी.

रेणु देवी के हैं 5 बच्चे: नीतीश कहते हैं कि महिलाएं अगर आत्मनिर्भरता के लिए कदम बढ़ाती तो समाज की कड़वी बातें भी सुनाई पड़ती थी. लोग ताने सुनाते थे, लेकिन ऐसी परिस्थितियों के बावजूद एक महिला ने गरीबी की मजबूरी में ही सही मगर आत्मनिर्भरता के लिए कदम बढ़ाया तो आज वह उदाहरण स्वरूप हो गई हैं. वो महिला हमारी मां है और हमें उन पर पूरा गर्व है. हम लोग आज भी बिना मां के मार्गदर्शन के कुछ नहीं करते, पिता की मौत के बाद हम 5 भाई-बहनों के लिए माता पिता सब कुछ मां है.

मां के दुकान चलाने पर बच्चों को लोग मारते थे ताना: रेणु देवी का संघर्ष इस बात से समझा जा सकता है कि वो खुद कई दिनों तक भूखी रह जाती थीं, लेकिन बच्चों को भूखा नहीं रहने दिया. उनकी शिक्षा रुकने नहीं दी. वो दिन भर दुकान चलाती थी और शाम में बच्चों को पढ़ाने के लिए बैठ जाती थी. रेणु खुद मैट्रिक तक पढ़ी हुई हैं, जब वो दुकान चलाती थीं तब समाज के लोग उनके छोटे बच्चों को ताना मारते थे कि मां महिला होकर दुकान चलाती है.

संदीप को खाना पड़ता था बासी खाना: संदीप कुमार की सफलता के पीछे उनकी मां का अद्भुत संघर्ष छुपा है. खुद रेणु देवी उन दिनों को याद कर भावुक हो जाती हैं और कहती हैं कि मेरा संघर्ष तो था ही मगर बेटे ने भी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी. संदीप जब पहली बार अपने गांव से बाहर पढ़ाई के लिए गया शहर गए थे, तब उन्हें खाना बनाने भी नहीं आता था. मैं जो खाना भेजती थी उसे वह रखकर तीन दिन तक खाता था.

गर्मी में खराब हो जाता था खाना: रेणु देवी इन बातों का जिक्र करते हुए रोने लगती हैं और कहती हैं कि हफ्ते में तीन दिन एक बस के माध्यम से यहां से खाना में रोटी सब्जी बनाकर भेजती थी. उन तीन दिनों के खाने को संदीप पूरे सप्ताह चलाते थे और उसी को खाकर अपनी पढ़ाई करते थे. जब कभी गर्मी में सब्जी खराब हो जाती थी, तब वो पानी और रोटी खा कर रहता था.

इतवार को मिलता था चावल: मां रेणु देवी बताती है कि वह पूरे सप्ताह घर से भेजा हुआ खाना ही खाता था. संदीप रोटी बचपन में कम खाते थे, लेकिन पढ़ाई के लिए मजबूर होकर रोटी खाना शुरू कर दिया. चावल उसे बेहद पसंद था लेकिन कर क्या सकते थे. चावल भेजते तो वह खराब हो जाता. संदीप हफ्ते में एक बार गया में स्थित अपनी मौसी के घर चावल खाने के लिए जाता था.

बड़ा बेटा सफल व्यापारी: रेणु देवी अपने पुराने दिनों को याद कर भावुक तो होती हैं, लेकिन साथ ही वह खुशी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि अब उनकी समस्याओं का दिन खत्म हुआ है. वह इस बात से खुश हैं कि उनके बच्चे सफल हुए हैं. बड़ा बेटा डुमरिया बाजार में ही एक सफल व्यापारी के रूप में स्थापित हुआ है. वह किराना दुकान चलाता है. दूसरा बेटा आईएएस बन गया है. तीसरा बेटा शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा है. उन्हें आशा है की संदीप की तरह वह भी सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेगा.

आगे भी चलाती रहूंगी दुकान : रेणु देवी अब भी दुकान चलाती हैं, वह कहती है कि बच्चे अब दुकान चलाने से मना करते हैं, लेकिन हमने अपने बच्चों से कहा कि नहीं यह दुकान मेरे संघर्षों की गवाह है. पति की विरासत है. मैंने अगर छोड़ दिया तो मैं अपने अस्तित्व को ही खो दूंगी.

“मेरी सफलता की ये पहचान है. अगर अब मैं दुकान नहीं चलाऊंगी तो लोग यही कहेंगे कि बेटा आईएएस बन गया है, इसलिए वो बड़े लोग हो गएहैं. मैं जमीन पर ही जुड़ी रहनी चाहती हूं. मैं अपनी दुकान खुद चलाऊंगी.”- रेणु देवी, आईएएस संदीप की मां

योद्धा है मेरी मां: बेटा नीतीश कुमार भी मां के इस फैसले की कदर करते हुए कहते हैं कि मेरी मां नारी शक्ति की मिसाल है. योद्धा वह नहीं है जो अच्छे दिनों में अपने अतीत को भूल जाए. मुझे खुशी है कि मेरी मां आज भी 60 साल की उम्र में दुकान चलाती है. हम उनके फैसले की कदर करते हैं, जब मां दुकान पर बैठती है तो बरकत होती है.

मिसाल बनीं रेणु देवी: डुमरिया के ही सामाजिक कार्यकर्ता जैदी खान कहते हैं कि रेणु देवी के पति शुंभ कुमार भी संघर्षशील व्यक्ति थे. वह अपने जीवन में गरीबी में भी दूसरों की सहायता के लिए आगे रहते थे, लेकिन जब उनका निधन हुआ तो परिवार की सहायता के लिए लोग आगे नहीं बढ़े. शंभू कुमार के यहां एक वक्त में दो अर्थी उठी थी.

एक साथ उठी थी ससुर और पति की अर्थी: दरअसल शंभू कुमार की मौत से पहले उनके पिता की मौत हुई थी. पिता की मौत की खबर सुनते ही शंभू अपने घर पहुंचे. पिता के शव को देखते ही शंभू बेहोश हुए और उनका निधन हो गया. परिवार के लिए यह समय बड़ा दुःख दर्द भरा था. तब रेणु देवी ने अपने बलबूते परिवार को संभाला.

“जब एक महिला कुछ करने को ठान लेती है तो रास्ते में जितनी भी रुकावटें आएं, वह सब उसके सामने दम तोड़ जाएंगी. क्षेत्र में रेणु देवी के संघर्ष की मिसाल दी जाती है. वह महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि पुरुषों के लिए भी प्रेरणा स्रोत हैं. मुसीबत और खराब परिस्थितियों का कैसे सामना किया जाता है, ये रेणु देवी के विश्वास से सीखा जा सकता है.”- जैदी खान,सामाजिक कार्यकर्ता

लालगढ़ में महिलाओं को दी नई राह: डुमरिया प्रखंड घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा है. इस क्षेत्र को लालगढ़ के नाम से जाना जाता था, लेकिन अब इस क्षेत्र को संदीप कुमार IAS और उसकी मां रेणु देवी के संघर्ष से भी जाना जाता है. संदीप इस क्षेत्र ही नहीं बल्कि सब डिविजन शेरघाटी के पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने तीन बार UPSC में सफलता प्राप्त की है और फिर IAS बने हैं.

ग्रामीण महिलाओं से आगे बढ़ने की अपील: इससे पहले संदीप ने आर्थिक तंगी के बावजूद आईआईटी मुंबई से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की थी. रेणु देवी के बड़े बेटे नीतीश कुमार कहते हैं कि उनकी मां क्षेत्र की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक उदाहरण है. अब तो सरकार भी महिलाओं को सशक्त और उद्यमी बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं को चला रही है. ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को खुद आगे बढ़कर अपनी पहचान बनाने की जरूरत है.

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